Skip navigation

Tag Archives: Bharitya kavita

This Poem is dedicated to all the Indian leaders, Specially to regional leaders, like Thakres, Maya, Mulayam…. And leaders who uses religious and regional sentiments for votes……..

[1]

इक विभत्स रूप लेके तू क्यू हे सामने खड़ा,

डूब जा, डूब जा, डूब जा, तू डूब जा….

डूब जा वही कंही जंहा हो अँधेरा घना,

डूब जा वही जंहा पर कोई ना तुझे पूछता,

डूब जा अभी यही, तू डूब सकता हर कही,

डूब जा कुछ ऐसे जिससे कुछ भला हो देश का…

मांगे तुने रक्त रंग, अब मोक्ष क्यू ना मांगता,

डूब जा, डूब जा, डूब जा, तू डूब जा….

[2]

डूब जा अधर में तू , डूब जा पाताल में,

डूबते हे सब बाड़ में, तू डूब जा आकाल में,

डूब जा दूर कही, डूब जा बस युही,

डूब जा वहा, जहा से कोई लोट कर ना आ सका….

विश्वास हे वो तू मेरा जो हर समय हे टूटता…

डूब जा, डूब जा, डूब जा, तू डूब जा….

[3]

डूब जा समुद्र में या डूब जा इक पात्र में,

डूब जा उस कोने में जो हो ना वास्तुशाश्त्र में,

डूब जा खुदी में, या डूब जा सभी में तू,

डूब के भी गर तू बचे, तो फिर से वापस डूब जा….

क्यों नहीं हर रोज तू शर्म से हे डूबता,

डूब जा, डूब जा, डूब जा, तू डूब जा….

__मनीष चोपड़ा

शब्द ढूंढे, अर्थ ढूंढे, सब लगता हे व्यर्थ ढूंढे |
स्वार्थ और निस्वार्थ ढूंढे,सब लगता हे व्यर्थ ढूंढे |
ऊँचे शिखर और गर्त ढूंढे, सत्य ढूंढे , मिथ्य ढूंढे,
कुछ करूंन, कुछ कठोर, कुछ उन्मुक्त ढूंढे |

धुंडी जब भी रोशनी, काल कुरूप अँधेरे संग ढूंढे,
चला समीप जब इन्द्रधनुष के, उसके रंग भी बे-रंग ढूंढे |
जब भी ढूंडा पवितर्ता को, द्वेष, कलह और रक्त ढूंढे,
कुछ धर्म की शाखाओ में बंधे फिर अपने इश्वर असमर्थ ढूंढे ….

ढूंडा नेतृत्व कई बार, उनमे अपने सपने साथ ढूंढे,
जहा भी ढूंडा, कुछ स्वार्थ मानुस हर वक़्त ढूंढे |
जब भी ढूंढे जवाब , मेने फिर तर्क ढूंढे,
ऊँचा होने से पहले ही, मेने फिर कुछ फर्क ढूंढे |

शब्द ढूंढे, अर्थ ढूंढे, सब लगता हे व्यर्थ ढूंढे |

मनीष चोपडा_